ऑफिस के बाहर का
वह पीला अमलतास
सुनहरे फव्वारे की तरह
कितनी ज़िद की थी मैंने
कानों में पहनने की
तुम हँसे थे
और हँसते गए थे
मेरी सुनहरी बालियां देखकर
गाल भी थपका था.
आज भी हंसी गूंजी थी तुम्हारी
गाल पर छुअन भी महसूस हुई
जब गुज़री नीचे से
उसी पीले अमलतास के
जो तब भी था
जब तुम थे
जो अब भी है
जब तुम नहीं |
वह पीला अमलतास
सुनहरे फव्वारे की तरह
कितनी ज़िद की थी मैंने
कानों में पहनने की
तुम हँसे थे
और हँसते गए थे
मेरी सुनहरी बालियां देखकर
गाल भी थपका था.
आज भी हंसी गूंजी थी तुम्हारी
गाल पर छुअन भी महसूस हुई
जब गुज़री नीचे से
उसी पीले अमलतास के
जो तब भी था
जब तुम थे
जो अब भी है
जब तुम नहीं |
very nice..very very nice..............keep writing rani beti...keep it up....mumma
ReplyDeletevery nice..very very nice..keep writing rani beti...keep it up..mumma
ReplyDelete