जब लौटती हूँ घर
थकी हारी
सूरज निकलने से दिन ढलने तक
कहीं न कहीं उलझी, मारी
तब
बहुत याद आती हो
माँ,
और याद आती है
तुम्हारी गोदी,
उसमें तुम्हारा लाड़ से सुलाना
पूरे घर में घूम घूम कर
मान मनुहार से
खिलाना,
तुम्हारी सुकून भरी थपकियाँ
तुम्हारा वह गुनगुनाना
बहुत याद आती है।
लगता है लौट चलूँ
ये सब छोड़
जहाँ खड़ी हूँ अभी
ठीक वहीं से लूँ अपना रस्ता मोड़
चल चलूँ वापस, अपने गाँव
तुम्हारी आँचल की छाँव
देखते ही मुझे तुम दौड़ती आओ
बाँहों में भरकर गले लगाओ
और
चेहरा लो मेरा चूम,
माँ,
बहुत याद आती हो तुम!
थकी हारी
सूरज निकलने से दिन ढलने तक
कहीं न कहीं उलझी, मारी
तब
बहुत याद आती हो
माँ,
और याद आती है
तुम्हारी गोदी,
उसमें तुम्हारा लाड़ से सुलाना
पूरे घर में घूम घूम कर
मान मनुहार से
खिलाना,
तुम्हारी सुकून भरी थपकियाँ
तुम्हारा वह गुनगुनाना
बहुत याद आती है।
लगता है लौट चलूँ
ये सब छोड़
जहाँ खड़ी हूँ अभी
ठीक वहीं से लूँ अपना रस्ता मोड़
चल चलूँ वापस, अपने गाँव
तुम्हारी आँचल की छाँव
देखते ही मुझे तुम दौड़ती आओ
बाँहों में भरकर गले लगाओ
और
चेहरा लो मेरा चूम,
माँ,
बहुत याद आती हो तुम!
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