कड़ाके की ठंड ... मुँह अंधेरे उठ कर तैयार होते बच्चे । उन्नींदी आँखें और शिथिल कदमों से बस की सीढ़ीयाँ चढ़ते...
... क्या ही अक्षर दिखते होगें उन्हे।
अभी तो आँखों की सीपीयों में मीठे सपनों के मोतीयों ने ही घर कर रखा है।
...आखिर सूरज निकला ही कहाँ है।
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