Sunday, December 8, 2013

दीवाली

Assignment Context : I got kidnapped by the goats of Garhwal...and this is my first Diwali.
Describing my first diwali..

आज जब पूरा गढ़वाल नींद की आगोश में था मैं आखिरकार वहाँ से भाग निकलने में सफल रहा. नदी, तालाब, झरनों और पहाड़ो को पार करता हुआ मैं किसी अनजान सी जगह आ कर रुका - झाझा. जितना अजीब नाम उतने ही अजीब वहाँ के लोग. पूरा का पूरा आवाम जैसे सड़कों और रास्तों पर ही था- अपने घर सी बाहर.

"मूर्खो, ठण्ड का महीना है, घर क अंदर जाओ."
पर मेरी किसी ने न सुनी उल्टा मुझे ऐसे घूर कर देखा मानो मैं कितनी नयी बात केह रहा हूँ.
"खैर, मत जाओ मेरा क्या. पर जो इतनी बिजली के बॉल जला रखा है उन्हें बंद कर दो यार."

इस बार एक आंटी, जो अपने साज श्रृंगार पर इतरा रहीं थी, ने ऐसी डांट लगायी कि पूछो मत. "अरे पागल है क्या. आज के दिन कोई अँधेरे में रहता है. माँ लक्ष्मी नाराज़ हो कर लौट गयीं तो?"

ओह. तो ये बात है. इसकी माँ आ रहीं है. तभी तो इतनी खुश है.

पर बाकी सारे? सभी की माँ एक साथ आ रही है क्या?

पूछने पर सभी ने वही कहा -' माँ लक्ष्मी आ रहीं हैं.'

कमाल है ! सब की माँ आ रहीं हैं और सबकी माँ का नाम भी एक ही है. बड़ी विचित्र जगह है भाई साब.

इतनी रौशनी अगर मैंने जलायी होती गढ़वाल में तो सरदारनी बकरी मुझे दो दिनों तक खाना नहीं देती.

अभी मैं अपने ख्यालों में खोया ही था की बड़ी ज़ोर का धमाका हुआ.. ये क्या था? मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी. फिर तो जैसे धमाको का सिलसिला ही चल पड़ा...एक के बाद एक. लगता है सबकी मम्मी आ गयीं. मुझे भी मेरी माँ की याद आ गयी जिसे मैंने कभी नहीं देखा. ऐसी ही रहीं होंगी वो भी.

पास खड़े एक बच्चे ने कहा - " आओ हमारे साथ पटाखे जलाओ."

-"पटाखे?"

"हाँ. दीवाली है ना. आओ. "

-"दीवाली?"

"अरे बाबा हाँ. याद नहीं क्या तुम्हे. आओ देखो मैं राकेट जलाने जा रहा हूँ."

और इसके पहले कि मैं कुछ समझ पता उसने एक छड़ी सी दिखने वाली चीज़ में आग लगायी और ये वो गयी.. और जाते ही गयी. और बहुत ऊपर जाने के बाद एक विस्फोट हुआ और कई रंग एक साथ आसमान में बिखर गए.

अरे वाह.. ये क्या चीज़ है.

कई रंग और ढंग के पटाखे जलाये हमने.  अब तक आंटी की मम्मी नहीं आयीं थीं . मेरे पूछने पर उन्होंने कुछ अलग ही कहानी सुनायी- राम और सीता की , उनके वनवास की. अच्छी लगी मुझे. पर आंटी की  मम्मी नहीं आयीं.

खाने का समय हुआ. जितने तरह के पटाखे हमने जलाये थे उसे भी ज्यादा तरीके के पकवान रखे थे. मज़ा आ गया. इतना खाना. इतना लाजवाब. मैंने छक्क कर खाया.

टहलने निकले तो पूरे शहर को सवरा पाया.




दीवाली कि चमक दमक. बहुत मज़ा आया मुझे.
सोचता रहा जा कर बकरीयों को सुनाऊँ ये कहानी.. बताऊँ कि घास खोजने के अलावा भी बहुत चीज़ें हैं दुनिया में.. सुन्दर. मज़ेदार.

पर नाह! अब नहीं लौटना वहाँ.
जा रहा हूँ एक शहर कि तलाश में, जहाँ बना सकूँ अपना घर... जहाँ आ सके मेरी भी माँ...अगली दीवाली.

Wednesday, November 20, 2013

चिठ्ठी

'तीन साल के भाई ने पूछा- "दीदी चिठ्ठी क्या होती है?" 
मैं मुस्कुरा उठी। SMS के ज़माने का बच्चा चिठ्ठी कैसे जानेगा । 

मन परेशान हो गया, कैसे बताऊँ? 
चिठ्ठी। एक कागज़ का टुकड़ा । पर उसके आने पर होने वाली खुशी, माँ का उसका पढ़ कर सुनाना, पापा का बीच बीच में मुसकुराना , डािकए की आवाज़, तार आने पर वह घबराहट... 
राखी पर बहनों की चिठ्ठी, नानी की चिठ्ठी पर माँ का सुबकना, बुआ की चिठ्ठी से दादी की आँखें भर आना। पापा के स्थानांतरण की खबर भी तो चिठ्ठी ही लेकर आई थी। कितने परेशान थे पापा।क्या क्या समझाऊँ? 

बहुत सोचा, िफर कहा - पहले हम SMS कागज़ पर लिख कर भेजते थे, वही चिठ्ठी है। 

"एरोप्लेन बना कर?"

हँस पड़ी मैं। "हाहा हाँ एरोप्लेन बना कर।"


आँखें ऐसे चमक रही थी उसकी, जिंदगी का कोई गूढ़ रहस्य समझ लिया हो जैसे।'

Tuesday, November 19, 2013

सर्दी की अलसाई सुबह

कड़ाके की ठंड ... मुँह अंधेरे उठ कर तैयार होते बच्चे । उन्नींदी आँखें और शिथिल कदमों से बस की सीढ़ीयाँ चढ़ते... 
... क्या ही अक्षर दिखते होगें उन्हे। 
अभी तो आँखों की सीपीयों में मीठे सपनों के मोतीयों ने ही घर कर रखा है।


...आखिर सूरज निकला ही कहाँ है।