Monday, June 30, 2014

घर और मकान

उसने कहा - वह घर कितना अच्छा है न !

नज़र उठायी । सामने एक आलिशान दोमंजिली इमारत - सफ़ेद रंग - शान्ति का प्रतीक ... पर शांन्ति से कोसों दूर।  सुना है मैंने बेटों को झगड़ते अपने वृद्ध पिता से ... आपस में लड़ते ... और देखा है बहू  को सामान समेट कर जाते।  नहीं देखा है तो उनकी बिटिया को ...  सालों से ... माँ बाप का हाल पूछते ... राखी पर भाइयों से मिलते .... लाड़ करते .... इठलाते।

फिर उस ईंट गारे के गठन को घर कैसे बोलूँ !! मैंने तनिक सोच कर कहा - हाँ, वह मकान अच्छा है।


वह पीला अमलतास !!

ऑफिस के बाहर का
वह पीला अमलतास
सुनहरे फव्वारे की तरह
कितनी ज़िद की थी मैंने
कानों में पहनने की
तुम हँसे थे
और हँसते गए थे
मेरी सुनहरी बालियां देखकर
गाल भी थपका था.
आज भी हंसी गूंजी थी तुम्हारी
गाल पर छुअन भी महसूस हुई
जब गुज़री नीचे से
उसी पीले अमलतास के
जो तब भी था
जब तुम थे
जो अब भी है
जब तुम नहीं |